Saturday, March 28, 2015

पश्चिमी व्यवस्था VS इस्लामी व्यवस्था

मौजूदा दौर के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक सिद्धांतों और व्यवस्थाओं पर गहराई से अध्धयन करें तो स्पष्ट रूप से यह बात सामने आती है कि हमारे जीवन के तमाम पहलुओं पर पश्चिमी व्यवस्था का वर्चस्व है| हालाँकि यह भी स्पष्ट है कि इस व्यस्था के दो पहलू हैं, प्रत्यक्ष रूप से यह बहुत आकर्षक और पुरकशिश नज़र आती है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप में इसका मामला बिल्कुल उलट है|आज दुनिया में अधिकतर देशों में यही यवस्था लागू है| शायद यह बताने की आश्यकता नहीं है की इस का नतीजा क्या है? और लोग अपने जीवन शैली से कितने संतुष्ट हैं? क्योंकि इस व्यस्था में ‘मानवता’ को कितनी जगह प्राप्त है? इस पर रोशनी डालने की ज़रूरत नहीं है|इस के दुष्परिणाम से हम सभी अवगत हैं|
प्रश्न यह है कि पश्चिमी व्यस्था क्या है? तो जान लीजिये की इस को बहुत ही खूबसूरती के साथ ‘लिबरल सेकुलरिज्म’ कहा जाता है| कहते हैं कि यह ऐसी व्यस्था है जो ज़रुरत के वक़्त खुद को ढाल लेती है|आश्चर्य उस वक़्त होता है कि जब आपको अपनी व्यस्था पर पूरा यकीन है और यह एक शांतिपूर्ण जीवन के अनुकूल है तो फिर आपको इस्लाम और उसकी व्यस्था पर आलोचना करने और विभिन्न प्रकार की मक्कारी करके इस्लाम और इसके व्यस्था को दबाने कि आश्यकता क्यों है?आखिर क्या वजह है कि पश्चिमी देश हाथ धोकर और पूरे तन-मन-धन से उभरते हुए किसी भी इस्लामी देश को बर्बादी के दहाने  पहुचाने पर तुले हुए हैं? पाकिस्तान, ईराक, अफगानिस्तान, सीरिया, मिस्र, फ्लिस्तीन और अब धीरे-धीरे सऊदी अरब इसके जिंदा उदहारण हैं|
हक़ीक़त यह है कि पश्चिमी देशों को सदियों से ही इस्लामी व्यवस्था कांटे की तरह चुभती रही हैं| जिसकी प्रतिक्रया हमें गाहे-बगाहे देखने को मिलती रहती हैं|यह बात तो सभी जानते हैं कि पश्चिमी व्यवस्था की बुनियाद पूरी तरह पूंजी पर टिकी है| पूँजी कमाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहते है| अगर बात पूँजी की हो तो चोरी, बेईमानी, दहशतगर्दी, मानवता विरुद्ध कोई भी काम इनके लिए जायज़ हो जाता है क्योंकि ये खुद ही कहते हैं कि “हमारी व्यवस्था खुद को माहौल के अनुकूल ढाल लेती है”.....तो आखिर सही तो कहते हैं न!! हंसी तो उस वक़्त आती है जब खुद को सेक्युलर कहने वाले, पश्चिमी व्यवस्था की लहर में आँख बंद करके बह जाने वाले लोगों के साथ जब वही कुछ होता है जो पूँजी कमाने के लिए और पूंजीवादी वातावरण पैदा करने के लिया ज़रूरी होता तो फिर वे लोग ‘मानवता पर ज़ुल्म’ और ‘मर्यादा पर आंच’ की बात क्यों करते हैं? मेरी मुराद क्या है यह तो आप समझदारों को समझ में आ ही गई होगी|||||
जबकि इस्लामी व्यवस्था इस प्रकार की विचारधारा पर अमल नहीं करती है बल्कि उसकी अपनी ऑडियोलॉजी है जिसके अनुसार वह हर कार्य को अंजाम तक पहुंचती है| जगह और मौक़ा देख कर रंग बदलना इस की फितरत कभी नहीं रही है|इस प्रकार यह पूंजीवादियों की राह की रुकावट है|ऐसे में इस प्रकार की व्यवस्था का विरोध करना आवश्यक हो जाता है|इसलिए वे हमेशा कहते फिरते हैं की इस्लामी व्यवस्था एक बेलचक व्यस्था है जो कि किसी खास ऑडियोलॉजी पर निर्भर है, हालाँकि यह पूरी तरह से गलत और इस्लाम के विरुद्ध एक प्रोपेगंडा है|
मैं यह मानता हूँ कि इस्लाम की अपनी एक ऑडियोलॉजी है लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वह एक बेलचक व्यवस्था है|कुछ जगहों पर इस्लाम सीधा-सीधा कानून देता है और बहुत सारी जगहों पर बुनियादी हिदायत (direction) देकर क़ानून साज़ी को उलमा के इज्तिहाद पर छोड़ देता है|ये सब बातें वे सभी जानते हैं पर चाहते हैं की इस्लाम पश्चिमी व्यवस्था के अनुसार और लिबरल सेक्युलर के दायरे में आकर अपनी लचक दिखाए जो कि नामुमकिन है क्यूंकि इनकी व्यवस्था ऐसी है ही नहीं जो कि इस्लामी व्यवस्था के हम पल्ला हो सके| इस्लाम की यह खूबी है कि वह अपने दृष्टिकोणों, सिद्धांतों और प्रस्तावों के बारे में स्पष्ट मौकिफ रखता है जबकि पश्चिम के पास अपने सिद्धांतों के बारे में एसी लफ्फाजियां और ढीली-ढाली परिभाषाएं हैं जो कि अपनी मर्ज़ी और आर्थिक फायदों के साँचो में आसानी से ढाली जा सकती है|


   

Monday, March 23, 2015

"मंगनी" यह क्या बला है ?????

हर समाज की अपनी एक सांस्कृतिक और पारम्परिक पहचान होती है| हम भी उसी का एक हिस्सा हैं| जिसका अनुभव हमें गाहे-बगाहे होता रहता है|संस्कृति और परम्परा का जुडाव जीवन से ऐसा है कि इसके न होने से किसी समाज का होना संभव नहीं है|गौरतलब बात यह है कि कभी कभी हम अपनी परम्परा को लेकर इतनी हद तक बढ़ जाते हैं और ऐसे ऐसे रस्म बना लेते हैं की उसका मतलब समझते-समझते भी हम समझ नहीं पाते और आँख बंद कर के उसकी पैरवी समाज में रहने की वजह से ज़रूर करते हैं|इन्ही परम्परावों में से एक परम्परा “रस्म-ए-मंगनी” है|मैं ने बहुत सोचा लेकिन मुझे शादी के लिए मंगनी का होना क्यों ज़रूरी है अभी भी समझ से बाहर है| मुझे एक ही बात समझ में आई कि यह मंगनी नहीं बल्कि “टंगनी” होती है|जिसके सहारे लड़के और लड़की को लटका दिया जाता है|माता पिता लड़कों के लिए आने वाले रिश्तों से तंग आकर मंगनी कर देते हैं ताकि लोगों को यह पता चल सके कि हमारा लड़का रिज़र्व हो चूका है|
अगर बात लड़के और लड़की की कीजाए तो उनके लिए मगनी एक ऐसा बंधन है जिसमें दोनों बेक़रारी की दुनिया में बेक़रार रहते हैं|अगर उनके दिल का हाल पूछो तो वे हाल-ए-दिल बता ही नहीं पाते|मज़े की बात यह है कि ऐसी हालत में कोई साथ भी नहीं देता और सितम की बात यह कि बेचारा किसी से अपने दुःख-दर्द का इज़हार भी नहीं कर सकता|
मंगनी के बाद विभिन्न प्रकार के ख्यालात लड़के और लड़की के दिमाग में आते रहते हैं| लड़का इसलिए परेशान रहता है कि आखिर यह कैसी बला है जो आने से पहले ही तकलीफ दे रही है, यह कैसा कच्चे धागे से जुड़ा हुआ मज़बूत रिश्ता है जिस से जुदा होकर भी हम जुदा नहीं हैं और क़रीब होकर भी क़रीब नहीं.........यह कैसा रिश्ता है जो पास आने नहीं देता और किसी और के पास जाने भी नहीं देता|
उधर लड़की की हालत और ख़राब रहती है............दिल में सौ-सौ उम्मीदें बंधती-टूटती रहती हैं ........ कभी वह अपने आने वाली ज़िन्दगी की पुरकैफ बहारों की ताज़गी महसूस करके दिल ही दिल में खुश होती रहती है ..... तो कभी जीवन में अनजान मुसाफिर का ख्याल आते ही चेहरे की मुस्कराहट शर्म के मारे सुर्खी में बदल जाती है.........और कभी माथे पर शिकन और चेहरे पर परेशानी के चिन्ह प्रकट हो जाते हैं कि अगर यह रिश्ता अधूरा रह गया तो कितनी रुसवाईयां होंगी ..... शायद फिर कोई अच्छा रिश्ता भी न मिल पाए| लोग तो यही सोचेंगे की मुझमें ज़रूर कोई कमी है तभी तो बना बनाया रिश्ता टूट गया|

इन सारी उलझनों का जड़ कुछ और नहीं बल्कि यह टंगनी होती जो मंगनी की शक्ल में नमूदार होती है|       

Monday, March 9, 2015

                                                               रूम पार्टनर के नाम

आज के इस भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी में कॉम्पटीशन का बोल बाला है ऐसे में पैसा कमाना और अच्छी  जॉब प्राप्त करना मुश्किल होता जा रहा है|और फिर काम चलाऊ सैलरी में से फैमली के लिए बचत करना किसी बड़े चेलेन्ज से कम नहीं| इसी के चलते हमारे लिए खाने-पीने और रहने-सहने आदि का बंदोबस्त कम खर्च पर करना अनिवार्य हो जाता है| मंहगे रूम रेन्ट और प्रतिदिन खाना बनाने की झंझट की वजह से हमको पार्टनर के साथ रहना पड़ता है|दिन भर काम करने या शाम को कॉलेज से लौटने के बाद हर कोई सुकून, शांति और संतुष्टि के कुछ लम्हात जीना चाहता है जिसको क्रियात्मक (अमली) बनाने में रूम पार्टनर और वातावरण की भूमिका सबसे अहम होती है| इसीलिए लोगों को ऐसे पार्टनर की तलाश होती है जो रूम के वातावरण को घर का माहौल अर्जित(फराहम) कर सके| यही वजह है कि हर किसी को एक अच्छा रूम पार्टनर बनने का प्रयास करना चाहिए| अब सवाल यह है कि किसी रूम का वातावरण अच्छा   कैसे हो??? तो आइये मैं इसका जवाब आप को प्रदान करता हूँ :-
·         सबसे पहली बात किसी के साथ रहने के लिए ज़रूरी है की आप सहनशीलता (तहम्मुल) और सहिष्णुता (बुर्दबारी) से काम लेना जानते हों|
·         जितने भी लोग आप के साथ रहते हों उनके दिलों में मोहब्बत के जज़्बात हों|
·         सभी लोग ज़िम्मेदारी के एहसास को समझें क्योंकि एक की गैर ज़िम्मेदारी से दोसरों को तकलीफ हो सकती है|
·         हर कोई क़ुरबानी देना जानता हो| इस से हमारे दिलों में सदभावना की आग खुद ब खुद चिराग़ पा हो जाती है|
·       अगर कोई बुरा है तो उसकी बुराई करने के बजाय अपने काम से उसको प्रभावित करने की कोशिश करें या उसे उसकी गलती पर आगाह करने के बाद उसे उसका सही हल बता दें क्योंकि बार-बार किसी की बुराई करने से वह आप की नज़र में कभी अच्छा हो ही नहीं सकता|
·         हर किसी में आगे बढ़ कर काम करने का ज़ज्बा होना चाहिए|
·         हर किसी के दोस्त को अपना दोस्त समझें| अगर उस में कोई कमी हो तो उसका मज़ाक न उड़ायें|
·         अगर किसी रूम पार्टनर में प्राकृतिक तौर पर कोई कमी हो तो उसको मुद्दा ना बनायें बल्कि एक दोस्त समझकर उसको उस से दूर करने की तरकीब तैयार करें|
·         सभी के बीच दोस्ती का रिश्ता होना चाहिए|