हर समाज की अपनी एक
सांस्कृतिक और पारम्परिक पहचान होती है| हम भी उसी का एक हिस्सा हैं| जिसका अनुभव
हमें गाहे-बगाहे होता रहता है|संस्कृति और परम्परा का जुडाव जीवन से ऐसा है कि
इसके न होने से किसी समाज का होना संभव नहीं है|गौरतलब बात यह है कि कभी कभी हम
अपनी परम्परा को लेकर इतनी हद तक बढ़ जाते हैं और ऐसे ऐसे रस्म बना लेते हैं की
उसका मतलब समझते-समझते भी हम समझ नहीं पाते और आँख बंद कर के उसकी पैरवी समाज में
रहने की वजह से ज़रूर करते हैं|इन्ही परम्परावों में से एक परम्परा “रस्म-ए-मंगनी” है|मैं
ने बहुत सोचा लेकिन मुझे शादी के लिए मंगनी का होना क्यों ज़रूरी है अभी भी समझ से
बाहर है| मुझे एक ही बात समझ में आई कि यह मंगनी नहीं बल्कि “टंगनी” होती है|जिसके
सहारे लड़के और लड़की को लटका
दिया जाता है|माता पिता लड़कों के लिए आने वाले रिश्तों से तंग आकर मंगनी कर देते
हैं ताकि लोगों को यह पता चल सके कि हमारा लड़का रिज़र्व हो चूका है|
अगर बात लड़के और लड़की की कीजाए
तो उनके लिए मगनी एक ऐसा बंधन है जिसमें दोनों बेक़रारी की दुनिया में बेक़रार
रहते हैं|अगर उनके दिल का हाल पूछो तो वे हाल-ए-दिल बता ही नहीं पाते|मज़े की बात
यह है कि ऐसी हालत में कोई साथ भी नहीं देता और सितम की बात यह कि बेचारा किसी से अपने
दुःख-दर्द का इज़हार भी नहीं कर सकता|
मंगनी के बाद विभिन्न
प्रकार के ख्यालात लड़के और लड़की के दिमाग में आते रहते हैं| लड़का इसलिए परेशान
रहता है कि आखिर यह कैसी बला है जो आने से पहले ही तकलीफ दे रही है, यह कैसा कच्चे
धागे से जुड़ा हुआ मज़बूत रिश्ता है जिस से जुदा होकर भी हम जुदा नहीं हैं और क़रीब
होकर भी क़रीब नहीं.........यह कैसा रिश्ता है जो पास आने नहीं देता और किसी और के
पास जाने भी नहीं देता|
उधर लड़की की हालत और ख़राब
रहती है............दिल में सौ-सौ उम्मीदें बंधती-टूटती रहती हैं ........ कभी वह
अपने आने वाली ज़िन्दगी की पुरकैफ बहारों की ताज़गी महसूस करके दिल ही दिल में खुश
होती रहती है ..... तो कभी जीवन में अनजान मुसाफिर का ख्याल आते ही चेहरे की
मुस्कराहट शर्म के मारे सुर्खी में बदल जाती है.........और कभी माथे पर शिकन और
चेहरे पर परेशानी के चिन्ह प्रकट हो जाते हैं कि अगर यह रिश्ता अधूरा रह गया तो कितनी
रुसवाईयां होंगी ..... शायद फिर कोई अच्छा रिश्ता भी न मिल पाए| लोग तो यही
सोचेंगे की मुझमें ज़रूर कोई कमी है तभी तो बना बनाया रिश्ता टूट गया|
इन सारी उलझनों का जड़ कुछ
और नहीं बल्कि यह टंगनी होती जो मंगनी की शक्ल में नमूदार होती है|
No comments:
Post a Comment