मौजूदा दौर के राजनीतिक,
सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक सिद्धांतों और व्यवस्थाओं पर गहराई से अध्धयन करें
तो स्पष्ट रूप से यह बात सामने आती है कि हमारे जीवन के तमाम पहलुओं पर पश्चिमी
व्यवस्था का वर्चस्व है| हालाँकि यह भी स्पष्ट है कि इस व्यस्था के दो पहलू हैं, प्रत्यक्ष
रूप से यह बहुत आकर्षक और पुरकशिश नज़र आती है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप में इसका मामला
बिल्कुल उलट है|आज दुनिया में अधिकतर देशों में यही यवस्था लागू है| शायद यह बताने
की आश्यकता नहीं है की इस का नतीजा क्या है? और लोग अपने जीवन शैली से कितने
संतुष्ट हैं? क्योंकि इस व्यस्था में ‘मानवता’ को कितनी जगह प्राप्त है? इस पर
रोशनी डालने की ज़रूरत नहीं है|इस के दुष्परिणाम से हम सभी अवगत हैं|
प्रश्न यह है कि पश्चिमी
व्यस्था क्या है? तो जान लीजिये की इस को बहुत ही खूबसूरती के साथ ‘लिबरल
सेकुलरिज्म’ कहा जाता है| कहते हैं कि यह ऐसी व्यस्था है जो ज़रुरत के वक़्त खुद को
ढाल लेती है|आश्चर्य उस वक़्त होता है कि जब आपको अपनी व्यस्था पर पूरा यकीन है और
यह एक शांतिपूर्ण जीवन के अनुकूल है तो फिर आपको इस्लाम और उसकी व्यस्था पर आलोचना
करने और विभिन्न प्रकार की मक्कारी करके इस्लाम और इसके व्यस्था को दबाने कि
आश्यकता क्यों है?आखिर क्या वजह है कि पश्चिमी देश हाथ धोकर और पूरे तन-मन-धन से
उभरते हुए किसी भी इस्लामी देश को बर्बादी के दहाने पहुचाने पर तुले हुए हैं? पाकिस्तान, ईराक,
अफगानिस्तान, सीरिया, मिस्र, फ्लिस्तीन और अब धीरे-धीरे सऊदी अरब इसके जिंदा
उदहारण हैं|
हक़ीक़त यह है कि पश्चिमी
देशों को सदियों से ही इस्लामी व्यवस्था कांटे की तरह चुभती रही हैं| जिसकी
प्रतिक्रया हमें गाहे-बगाहे देखने को मिलती रहती हैं|यह बात तो सभी जानते हैं कि
पश्चिमी व्यवस्था की बुनियाद पूरी तरह पूंजी पर टिकी है| पूँजी कमाने के लिए वह
कुछ भी करने को तैयार रहते है| अगर बात पूँजी की हो तो चोरी, बेईमानी, दहशतगर्दी,
मानवता विरुद्ध कोई भी काम इनके लिए जायज़ हो जाता है क्योंकि ये खुद ही कहते हैं
कि “हमारी व्यवस्था खुद को माहौल के अनुकूल ढाल लेती है”.....तो आखिर सही तो कहते
हैं न!! हंसी तो उस वक़्त आती है जब खुद को सेक्युलर कहने वाले, पश्चिमी व्यवस्था
की लहर में आँख बंद करके बह जाने वाले लोगों के साथ जब वही कुछ होता है जो पूँजी
कमाने के लिए और पूंजीवादी वातावरण पैदा करने के लिया ज़रूरी होता तो फिर वे लोग ‘मानवता
पर ज़ुल्म’ और ‘मर्यादा पर आंच’ की बात क्यों करते हैं? मेरी मुराद क्या है यह तो
आप समझदारों को समझ में आ ही गई होगी|||||
जबकि इस्लामी व्यवस्था इस
प्रकार की विचारधारा पर अमल नहीं करती है बल्कि उसकी अपनी ऑडियोलॉजी है जिसके
अनुसार वह हर कार्य को अंजाम तक पहुंचती है| जगह और मौक़ा देख कर रंग बदलना इस की
फितरत कभी नहीं रही है|इस प्रकार यह पूंजीवादियों की राह की रुकावट है|ऐसे में इस
प्रकार की व्यवस्था का विरोध करना आवश्यक हो जाता है|इसलिए वे हमेशा कहते फिरते हैं
की इस्लामी व्यवस्था एक बेलचक व्यस्था है जो कि किसी खास ऑडियोलॉजी पर निर्भर है,
हालाँकि यह पूरी तरह से गलत और इस्लाम के विरुद्ध एक प्रोपेगंडा है|
मैं यह मानता हूँ कि
इस्लाम की अपनी एक ऑडियोलॉजी है लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वह एक
बेलचक व्यवस्था है|कुछ जगहों पर इस्लाम सीधा-सीधा कानून देता है और बहुत सारी
जगहों पर बुनियादी हिदायत (direction) देकर क़ानून साज़ी को उलमा के इज्तिहाद पर छोड़ देता है|ये सब
बातें वे सभी जानते हैं पर चाहते हैं की इस्लाम पश्चिमी व्यवस्था के अनुसार और
लिबरल सेक्युलर के दायरे में आकर अपनी लचक दिखाए जो कि नामुमकिन है क्यूंकि इनकी
व्यवस्था ऐसी है ही नहीं जो कि इस्लामी व्यवस्था के हम पल्ला हो सके| इस्लाम की यह
खूबी है कि वह अपने दृष्टिकोणों, सिद्धांतों और प्रस्तावों के बारे में स्पष्ट मौकिफ
रखता है जबकि पश्चिम के पास अपने सिद्धांतों के बारे में एसी लफ्फाजियां और ढीली-ढाली
परिभाषाएं हैं जो कि अपनी मर्ज़ी और आर्थिक फायदों के साँचो में आसानी से ढाली जा
सकती है|
No comments:
Post a Comment